Sunday, 5 November 2017

मोबाइल


मोबाइल

कमसिन सुबह बहुत हसीन थी
सूरज की आँखों में हल्की सी नींद थी
वो जच रहा था नये पहनावे में
चंचल हवा भी आई इत्र के बहकावे में
बीवी और बच्चे का सिर सहलाते हुए
घर से निकला वो मुस्कुराते हुए
सड़कों पर गाड़ियों का हुजूम था
हर शॅक्स के सिर अजीब सा जुनून था
पहिए घूमते रहे, रास्ता कटता गया
मंज़िल करीब आई, फासला घटता गया
मगर वो पहुँचा नहीं, कभी अपने दफ़्तर
बस इक ढेर मलबे का, टीन और कनस्तर
वक़्त थम गया, पल दो पल के लिए
                                                         जो मुरझा गया, उस कंवल के लिए
क्या हुआ? किसीने पूछा चिल्लाते हुए
जवाब में इक बुज़ुर्ग बोला, झल्लाते हुए
ज़िंदगी की सवेर को रात कर रहा था
गाड़ी चलाते वक़्त
इक बेवकूफ…
मोबाइल पे बात कर रहा था…

                             (अनुराग शौरी)

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