Thursday, 15 February 2018
Wednesday, 14 February 2018
"बदलाव"
वक़्त बदल रहा है, दौर बदल रहा है
जीने-मरने का, इश्क़ का, तौर बदल रहा है
हवा है कुछ ज़हरीली, पानी का रंग है मैला
मुँह में जाने वाला हर कौर बदल रहा है
शर्मिंदा सी कलियाँ, तितली है सहमी सी
बाग उजड़ रहे हैं, बौर बदल रहा है
जानवर से इंसान, फिर
जानवर से बदतर
अब कौन कसर है बाकी, जो और बदल रहा है?
(अनुराग शौरी)
Thursday, 8 February 2018
अश्क ...
जा बरस
जा मेरी आँखों
से
पलकों से संभाला नहीं
जाता
सदियों से है
मेहमान रहा
तुझे और
पाला नहीं जाता
इक दबी
हुई सिसकी भी
है
इक रुकी
हुई हिचकी भी
है
इनको अपने
संग तू ले जा
मुझसे तो निकाला
नहीं जाता
रोटी, सब्ज़ी, थोड़ा
शरबत
ले जा,
के मिटे तेरी
ग़ुरबत
मुझको तो भूख
नहीं लगती
मुँह में
निवाला नहीं जाता
मुझको भी सफ़र तय करना है
इस कस्बे मैं नहीं मरना है
हर शक्स यहाँ पर काफ़िर है
कोई मधुशाला नहीं जाता
जा बरस
जा मेरी आँखों
से
पलकों से संभाला नहीं
जाता
सदियों से है
मेहमान रहा
तुझे और
पाला नहीं जाता…
(अनुराग शौरी)
Wednesday, 7 February 2018
Wednesday, 31 January 2018
तोहफा
जो टूट
सके, ना फूट
सके
यारों की तरह
ना रूठ सके
चाँदी की हवस
नहीं मुझको
पीतल का
इक खिलौना ला
दो
लिहाफ़ में हो
नींद नज़रबंद
तकिये में ख्वाबों
के पैबंद
मखमली नहीं, पत्थर
ही सही
तोहफे में इक
बिछौना ला दो
बिछड़े यारों के
संग गुफ्तगू
पहले प्यार
की पाक जुस्त्जू
नहीं ला
सकते तो इतना
करदो
हर दफ़्न
गुनाह, घिनौना ला दो
ना रिसे
कभी, ना सूखा
ही रहे
बस मुँह
बाए, भूखा ही
रहे
मेरे हिस्से
का ज़ख़्म, दर्द
बकाया
पूरा, आधा, पौना
ला दो
(अनुराग शौरी)
Wednesday, 24 January 2018
“गुज़ारिश”
“गुज़ारिश”
जो दर्द की बात
मैं छेड़ूँगा
तुम रुदन का राग सुनाओगे
इक टूटे दिल के तीखे
नश्तर
कोई दिल तुम क्या बहलाओगे
इक छल्नी जिस्म को
ढोते हो
मेरे ज़ख़्म को क्या
सहलाओगे
ना नींद ही है, ना
आस ही है
ख्वाबों को कैसे सजाओगे?
है भार तुम्हारे कंधों
पे
क्या मेरी लाश उठाओगे
है एक गुज़ारिश तुमसे
फिर भी
मुझे मंज़िल तक ले
जाओगे?
हमदर्द नहीं, और दोस्त
नहीं
क्या हमराही बन पाओगे?
(अनुराग
शौरी)
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